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सोयाबीन की कौन सी वैरायटी है बेस्ट: गोल पत्तों वाली या नुकीले पत्तों वाली? जानें पूरी सच्चाई

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  खेती-किसानी के आज के इस ब्लॉग में सभी किसान भाइयों का स्वागत है। सोयाबीन की बोनी का समय आते ही हमारे मन में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि सोयाबीन की कौन सी प्रजाति लगाएं? गोल पत्तों वाली या नुकीले पत्तों वाली? वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें दोनों ही वैरायटियों के अपने-अपने अनोखे और शानदार फायदे हैं। अगर आप सही चुनाव नहीं कर पा रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है। आइए दोनों की तुलना करते हैं ताकि आप अपनी जमीन और जरूरत के हिसाब से सही फैसला ले सकें। नुकीले पत्तों वाली सोयाबीन: सुरक्षा और हवा का बेहतरीन तालमेल नुकीले पत्तों वाली सोयाबीन की प्रजाति उन किसानों के लिए वरदान है जो कीटों और बीमारियों से परेशान रहते हैं। इसके मुख्य फायदे निम्नलिखित हैं:  प्राकृतिक कीट नियंत्रण: नुकीले पत्तों की बनावट ऐसी होती है कि हानिकारक कीटों (जैसे इल्ली) को इन पर अंडे देने में बहुत मुश्किल होती है। इससे आपकी फसल प्राकृतिक रूप से सुरक्षित रहती है। निचली फलियों का पूरा विकास: इन पत्तों के बीच खाली जगह होने के कारण सूरज की रोशनी और ताजी हवा पौधे के सबसे निचले हिस्से तक आसानी से पहुंचती है। नतीजा ...

सोयाबीन की कौन सी वैरायटी है बेस्ट: गोल पत्तों वाली या नुकीले पत्तों वाली? जानें पूरी सच्चाई

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  खेती-किसानी के आज के इस ब्लॉग में सभी किसान भाइयों का स्वागत है। सोयाबीन की बोनी का समय आते ही हमारे मन में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि सोयाबीन की कौन सी प्रजाति लगाएं? गोल पत्तों वाली या नुकीले पत्तों वाली? वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें दोनों ही वैरायटियों के अपने-अपने अनोखे और शानदार फायदे हैं। अगर आप सही चुनाव नहीं कर पा रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है। आइए दोनों की तुलना करते हैं ताकि आप अपनी जमीन और जरूरत के हिसाब से सही फैसला ले सकें। नुकीले पत्तों वाली सोयाबीन: सुरक्षा और हवा का बेहतरीन तालमेल नुकीले पत्तों वाली सोयाबीन की प्रजाति उन किसानों के लिए वरदान है जो कीटों और बीमारियों से परेशान रहते हैं। इसके मुख्य फायदे निम्नलिखित हैं:  प्राकृतिक कीट नियंत्रण: नुकीले पत्तों की बनावट ऐसी होती है कि हानिकारक कीटों (जैसे इल्ली) को इन पर अंडे देने में बहुत मुश्किल होती है। इससे आपकी फसल प्राकृतिक रूप से सुरक्षित रहती है। निचली फलियों का पूरा विकास: इन पत्तों के बीच खाली जगह होने के कारण सूरज की रोशनी और ताजी हवा पौधे के सबसे निचले हिस्से तक आसानी से पहुंचती है। नतीजा ...

आधुनिक खेती के लिए बैटरी स्प्रेयर का महत्व – किसानों के लिए फायदे और सही उपयोग

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🚜 आधुनिक खेती के लिए बैटरी स्प्रेयर का महत्व खेती में समय और मेहनत बचाने के लिए अब किसान भाई आधुनिक कृषि उपकरण का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन्हीं में से एक है बैटरी स्प्रेयर पंप। पहले किसान हाथ वाले पंप (मैनुअल स्प्रेयर) का उपयोग करते थे, जिसमें ज्यादा मेहनत लगती थी। लेकिन बैटरी स्प्रेयर ने इस काम को बहुत आसान और तेज बना दिया है। --- 🔹 बैटरी स्प्रेयर क्या है? बैटरी स्प्रेयर पंप एक ऐसा स्प्रेयर है जो बैटरी से चलता है। इसमें किसान को लगातार हाथ से दबाव बनाने की जरूरत नहीं होती। बस बैटरी ऑन करें और नली से दवा या तरल खाद आसानी से पौधों तक पहुँच जाता है। --- 🔹 बैटरी स्प्रेयर के फायदे 1. समय की बचत – कम समय में ज्यादा खेत में छिड़काव संभव। 2. कम मेहनत – हाथ से पंप करने की जरूरत नहीं। 3. समान छिड़काव – दवा और खाद पौधों तक बराबर पहुँचती है। 4. कम लागत – डीजल/पेट्रोल की जरूरत नहीं, सिर्फ चार्ज करना होता है। 5. लंबी दूरी तक स्प्रे – कुछ बैटरी स्प्रेयर 15–20 फीट तक दवा फेंक सकते हैं। --- 🔹 बैटरी स्प्रेयर कहाँ ज्यादा उपयोगी है? सब्जियों की खेती (टमाटर, मिर्च, बैंगन आदि) कपास, सोयाबीन, धान और गेहूं...

फूले दृवा (KDS 992) सोयाबीन है, सबसे ज्यादा पैदावार देनेवाली सोयाबीन की प्रजाति

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 आज आपको सोयाबीन की सबसे ज्यादा पैदावार देनेवाली प्रजाति के बारे में बताने वाले है, ये सोयाबीन की प्रजाति बहोत ही जबरदस्त है, और किसान भाई को बहोत ही ज्यादा फायदा पहोचाने वाली है, पूरा वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करे                     इस प्रजाति का नाम है फूले दृवा   KDS 992                    इस प्रजाति को महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी . कृषि संशोधन केंद्र , डिग्रज . इन्होंने विकसित किया है।  इस प्रजाति की खासियत ये है की , इस प्रजाति के पौधे का फैलाव और  इसकी हाइट अच्छी है, जिसके कारण इसमें फूल और फल्लियां बहोत ज्यादा तादात में लगती है, इसका दाना बहोत मोटा होता है, और उसमे 18.25% तेल होता है, जिसके कारण ये प्रजाति सबसे ज्यादा पैदावार देती है। एक एकड़ के लिए आपको 25 से 30 किलो बीज लगेंगा और ये प्रजाति 100 से 105 दिनो में पककर तयार हो जाएंगी। इस प्रजाति में रोगों सहेने की क्षमता अच्छी है, जिसके कारण इसमें ज्यादा रोग नही आता इसकी पैदावार 25 से 30 क्विंटल पर ह...

कम समय में आनेवाली सोयाबीन की नई प्रजाति MACS 1188

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MACS 1188  ये कम समय में आने वाली सोयाबीन की प्रजाति है। बड़े साइज के दाने, और 3 से 4 दानों की फल्ली  100 दानों का वजन 11.5 से 12 ग्राम होता है, इसके पौधे को सफेद फूल आते है, और इसके फल्ली पे बालों जैसा बारीक रूवा होता है,  ये प्रजाति जब पक जाती है, इसकी फलियां पूरी सुख जाति है, तो ये फूटती नही, जिसके कारण हमारा नुकसान नहीं होता, ये प्रजाति के पौधे का खोड़ मोटा होता है, जिसके कारण पौधा जमीन पे गिरता नही, पौधे को फल्लियां जमीन से 5 से 7 सेमी, ऊपर लगती है,  MACS 1188 सोयाबीन 100 दिनो में पककर तयार हो जाती है, जहां पर सब्टेंबर महीने के आखिर तक बारिश अच्छी होती है, और पानी का अच्छा बंदोबस्त है, ऐसी जगह पे इस प्रजाति को बोना चाहिए, इसकी उत्पादन क्षमता 12 से 15 प्रति एकड़ है, एक एकड़ के लिए आपको 25 किलो बिक लगता है, और इस सोयाबीन के प्रजाति में रोगों को सहेने की क्षमता बहोत है, इसलिए इस पर कोईभी रोग ज्यादा असर नहीं करता है,

HI- 1544 गेहूं की पूरी जानकारी, HI-1544 गेहूं कैसा है

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  HI -1544 गेहूं  आज हम आपको HI-1544 गेहूं के बारे में पूरी जानकारी देने वाले हैं। HI-1544 गेहूं एक उच्च उपजाऊ गेहूं की विशेष जाति है, जो भारत में इसकी खेती की जाती है। यह गेहूं विभिन्न मौसम और जलवायु शर्तों में अच्छी उपजाऊता प्रदर्शित करता है। HI-1544 गेहूं उत्तम रूप से खेती के लिए समर्थ होती है, और इसमें अच्छी गुणवत्ता वाला आटा बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस गेहूं में अच्छी बीजता होती है और यह विभिन्न प्रकार के भोजन उत्पादों के लिए उपयुक्त होती है। HI-1544 गेहूं की खेती भारत के कई क्षेत्रों में की जाती है और यह उत्तर भारतीय राज्यों में प्रमुख रूप से पायी जाती है। HI-1544 गेहूं ये गेहूं  110 से 115 दिनों में पककर तयार हो जाता है। 2 से 3 पानी में ये गेहूं आ जाता है, (अच्छी भरी जमीन में ) ये गेहूं एक एकड़ में 34 से 38 क्विंटल होता है। इस का दाना मोटा और चमकदार होता है। इसका तना अच्छा मोटा होता है, और कल्लो (ब्रांचेस) की संख्या ज्यादा होती है। इसकी हाईट कम होने से ये गेहूं गिरता नही है।

काबुली चने की नई प्रजाति PKV-2 की पूरी जानकारी

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  PKV-2 PKV-2 चना एक प्रमुख चने की जाति है जो कि महाराष्ट्र कृषि विद्यापीठ (Maharashtra Krishi Vidyapeeth) द्वारा विकसित की गई है। यह चना विशेष रूप से उत्तम उत्पादकता, बीमारी प्रतिरोधकता, और मानव एवं पशु पोषण के दृष्टिकोण से प्रसिद्ध है। PKV-2 चना का विशेषतः यह लाभ होता है कि यह विभिन्न क्षेत्रों में उच्च उत्पादकता और अच्छी गुणवत्ता वाले दानों को प्रदान करता है। इसका पोषणीय मूल्य भी उच्च होता है जो पशुओं के लिए भी उत्तम होता है। यह चना सामान्यतः फसलों में मानसून के दौरान बोया जाता है और उत्तर भारत के अनुकूल मौसम वाले क्षेत्रों में अच्छे रूप से विकसित होता है। PKV-2 चना का पोषणीय मूल्य और उच्च उत्पादकता उसे एक विशेष चने की जाति बनाता है जो कि किसानों के लिए लाभकारी हो सकती है। रबी सीजन में बोने का समय उत्तम निर्धारित किया गया है.! चने कि यह जल्दी पकने वाली किस्म है, इसकी अवधि 95 से 115 दिन तक की होती है.! वर्षा की कमी में या केवल एक सिंचाई देने पर भी सूखे की स्थिति होने पर भी यह किस्म उत्तम परिणाम देने में सक्षम है.! इस किस्म में लाइन से लाइन की दूरी 18 इंच (45 X 10 सेंटीमीटर) रखन...

एरंडी की खेती कैसे करते हैं

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  एरंड की फ़सल  एरंडी (जिसे अंग्रेजी में Castor भी कहा जाता है) की खेती एक व्यापक विषय है जिसमें कई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां कुछ मुख्य चरण दिए गए हैं जो एरंडी की खेती में मदद कर सकते हैं: 1. बीज और बुआई : उत्तम फसल प्राप्त करने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले बीज का चयन करें। इसे मिट्टी में 1-2 सेमी गहराई में बुआई करें। 2. मिट्टी की तैयारी : अच्छी द्रावणी मिट्टी को चुनें और खाद्यानुसार उसे तैयार करें। मिट्टी में अच्छी ड्रेनेज और गहराई बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है। 3. सिंचाई : एरंडी को पूरे विकास के लिए नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है। अधिकतम पानी की आवश्यकता बीज बुआई के समय होती है। 4. रोग और कीट प्रबंधन : नियमित रूप से खेती क्षेत्र को परीक्षण करें और यदि आवश्यक हो तो रोग और कीटों को नियंत्रित करने के उपाय अपनाएं। 5. फसल की देखभाल : समय-समय पर खेती क्षेत्र को साफ़ और सुरक्षित रखें। यह सुनिश्चित करने के लिए कि पौधों को नुकसान न हो, उन्हें प्रकोपित कीटों और रोगों से बचाने के लिए सतर्क रहें। 6. विकास और पक्षागार : एरंडी की पूरी फसल को उसकी सही उम्र पर गठित करें। बीज और ...

लिक्विड यूरिया के फायदे

 लिक्विड यूरिया कई तरह की खेती में उपयोगी हो सकती है। इसके कुछ मुख्य फायदे निम्नलिखित हो सकते हैं: 1. त्वरित निष्कर्षण : लिक्विड यूरिया का उपयोग करने से पौधों को पोषक तत्व त्वरित रूप से मिल जाते हैं, जिससे उनकी उच्च ग्रोथ दर होती है। 2. पोषक तत्व स्थिरता : यूरिया में मौजूद नाइट्रोजन जल्दी से पौधों द्वारा अवशोषित होता है और फसल को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है, जिससे पौधों की स्थिरता बनी रहती है। 3. जल संचयन : लिक्विड यूरिया को पानी में मिलाकर प्रयोग करने से जल संचयन बढ़ता है, क्योंकि यह पौधों द्वारा सर्वश्रेष्ठ रूप से अवशोषित होता है। 4. समीक्षित पोषण : यूरिया का उपयोग फसलों को समीक्षित और संतुलित पोषण प्रदान करने में मदद करता है, जिससे उनकी उत्पादकता में सुधार होता है। लिक्विड यूरिया को समझने से पहले और इसे उपयोग करने से पहले, स्थानीय कृषि निकायों या कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेना उचित होता है, क्योंकि यह विशेष खेती की प्रकृति, मौसम, और फसल के लिए विशेष रूप से अनुकूल हो सकता है।

गेहूं की फसल में पानी कोनसे समय देना चाहिए

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  गेहूं की प्रमुख विकास चरणों में सिंचाई की आवश्यकता भूमि की नमी, मौसम और वातावरणीय तत्वों पर निर्भर करती है। गेहूं के विभिन्न चरणों में सिंचाई की आवश्यकता निम्नलिखित हो सकती है: 1. बोने के समय : बोने के समय में प्राथमिक तौर पर उपयुक्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है ताकि बीज बूट करने के बाद अच्छे से उग सके।  2. पौधों के उगाने के समय : गेहूं के पौधों के उगने के समय में भी सिंचाई की जरूरत होती है। 3. बूट की विकास के समय : जब गेहूं का बूट बन रहा होता है, तो सिंचाई की आवश्यकता बढ़ जाती है। 4. गेहूं के पकने के समय : गेहूं के पकने के समय में भी सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है, विशेषकर अगर मौसम अत्यधिक गर्म या बारिश कम हो रही हो। इन सभी चरणों में, सिंचाई की मात्रा और अक्षमता की व्यवस्था भूमि की प्रकृति, प्राकृतिक नमी, बूटों की संख्या, विशेषताएं आदि पर निर्भर करेगी। यह स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से परामर्श लेना उपयुक्त होगा ताकि आपको सटीक सिंचाई की जानकारी मिल सके।

गेहूं की फसल में NPK, सल्फर, यूरिया कितना देना चाहिए

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 गेहूं की फसल में खाद्यानुसार विभिन्न मात्राओं में खाद्यांकों की आवश्यकता होती है। यह विभिन्न क्षेत्रों और मौसम के आधार पर भी बदल सकती है। नीचे एक सामान्य चार्ट दिया गया है जो गेहूं की सामान्य खाद्यानुसार सिफारिश करता है: 1. **NPK खाद्यानुसार (किलो प्रति हेक्टेयर):**    - नाइट्रोजन (N): 100-120    - फॉस्फेट (P): 50-60    - पोटाश (K): 40-50 2. **सल्फर (किलो प्रति हेक्टेयर):**    - 20-30 3. **यूरिया (किलो प्रति हेक्टेयर):**    - 60-80 4. **नॉर्मल (किलो प्रति हेक्टेयर):**    - 30-40 ध्यान दें कि यह सिफारिशें आम रूप से हैं और स्थानीय मानदंडों, भूमि की उपलब्धता, पिछली फसलों और मौसम की शर्तों के आधार पर बदल सकती हैं। इसलिए, सबसे अच्छा होगा कि आप अपने क्षेत्र के कृषि विशेषज्ञ से सलाह लें और वहाँ की भूमि के अनुसार खाद्यानुसार को निर्धारित करें।

रंगबिरंगी मक्का की खेती कैसे करें, जिसकी मार्केट में बहोत डिमांड बढ़ती जा रही है, पूरी जानकारी

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आज आपको रंगबेरंगी मक्का के बारे में बताने वाले है, जिसकी खेती करके आप बहोत सारे पैसे कमा सकते हो,   वो कैसे चलिए आपको बताते है। ये मक्का की खासियत ये है की , इसका हर एक दाना अलग रंग का होता है, जिसके कारण ये मक्का बहोत आकर्षित दिखती है, और खाने में भी बहोत स्वादिष्ट लगती है। ग्राहक इसे देखते ही खरीद लेते है।  चलिए जानते है की इसका उत्पादन हम कैसे ले सकते है। ये मक्का का उत्पादन हम आम मक्का के तरह ही ले सकते है, इसकी मार्केट में बहोत सारी प्रजातियां उपलब्ध है, आप कोईभी अच्छी प्रजाति लेकर अपने खेत में इसकी बुवाई कर सकते है। बुआई और दूरी : बुआई को सही समय पर करें और बीच दो माखी की दूरी रखें ताकि पौधे अच्छे से विकसित हो सकें।रब्बी और खरीफ दो ही सीजन में हम इसकी बुवाई कर सकते है, प्रजाति के टेस्ट वेट अनुसार लगभग 7 से 8 किग्रा प्रति एकड़ बुवाई के लिए बीज लेना चाहिए। आपको खरपतवार(घास) नही होने देना है, इस खास खयाल रखना है।   सिंचाई : समय समय पर सिंचाई करें, खासकर फूलने के समय में। उचित जल समीक्षा करें और बर्डर इर्रिगेशन की तकनीक का...

10.26.26 खाद और उसके फायदे

10.26.26 एक प्रकार की NPK खाद होती है, जिसमें नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), और पोटाश (K) की विशेष अनुपात में मिश्रण होता है। इस खाद में विशेष पोषण तत्वों की यह समानुपातिक मिश्रण खेती में उपयोगी होता है। फायदे : 1. विकास और ग्रोथ को सहायता: NPK खाद पौधों की समृद्ध विकास और ग्रोथ के लिए आवश्यक नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, और पोटाश प्रदान करती है। 2. फसल के उत्पादन में वृद्धि : यह खाद फसल के उत्पादन में वृद्धि कर सकती है, विशेष रूप से पौष्टिकता और बढ़ी हुई उपजाऊता के माध्यम से। 3. बेहतर रोपण : इसमें मौसम की परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न प्रकार के पोषण तत्वों की सहायता होती है, जो सही समय पर पौधों को प्रदान किये जा सकते हैं। 4. रोग प्रतिरोध : NPK खाद उत्पादों को रोगों और कीटों से बचाने में मदद कर सकती है, क्योंकि यह पौधों को स्ट्रेस से बचाव करने में सहायता करती है। 5. फलदायकता : यह पौधों की मानक फलदायकता को बढ़ा सकती है और बेहतर उत्पादन प्रदान कर सकती है। NPK 10.26.26 एक व्यापक रूप से प्रयोग की जाने वाली खाद है, लेकिन प्रत्येक खेती के लिए व्यक्तिगत परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए सही मात्रा और समय ...

अच्छी पैदावार देने वाली चनेकी प्रजातियां

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भारत में कई प्रकार की चना (ग्राम) प्रजातियां हैं जो अच्छी पैदावार देने वाली मानी जाती हैं। यहां कुछ मुख्य चना प्रजातियां हैं जो पैदावार में प्रसिद्ध हैं: 1. काबुली चना (Kabuli Chana) : यह चना बड़ी चकोर आकार की होती है और उच्च गुणवत्ता वाली मानी जाती है। यह चना उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है और बड़ी उपजाऊता देती है। 2. डेसी चना (Desi Chana) : यह चना छोटे आकार की होती है और ज्यादातर मध्य और दक्षिण भारत में उगाई जाती है। यह बाजार में बहुत प्रसिद्ध है और अच्छी पैदावार देती है। 3. मटर चना (Matar Chana) : यह चना भी भारत में व्यापक रूप से उगाई जाती है और पैदावार में मानी जाती है। यह चना उत्तर भारत में प्रचलित है। 4. काला चना (Kala Chana) : यह भी भारत में व्यापक रूप से उगाया जाता है और पैदावार में प्रसिद्ध है। यह चना उत्तर और मध्य भारत में उगाया जाता है। यह प्रजातियां भारतीय बाजार में प्रमुखता से मिलती हैं और पैदावार में अच्छा उत्पादन करती हैं। लेकिन इसके अलावा भी अन्य चना प्रजातियां होती हैं, जो कि अलग-अलग क्षेत्रों में अच्छी पैदावार देती हो सकती हैं। व्यापक रूप से पैद...

सबसे ज्यादा पैदावार देने वाली गेहूं की प्रजातियां कौनसी है

भारत में कई प्रकार की गेहूं प्रजातियां उगाई जाती हैं, लेकिन यहां कुछ प्रमुख प्रजातियां हैं जो ज्यादा पैदावार देने वाली मानी जाती हैं: 1. सरसोदी (HD 2967) : यह भारत में एक प्रमुख गेहूं की प्रजाति है जो अच्छी पैदावार देती है। यह अधिकतर उत्तर भारत में उगाई जाती है और अच्छी उपजाऊता की दृष्टि से लोगों की पसंदीदा प्रजाति है। 2. सूखाड़ (DBW 17) : यह गेहूं की एक अन्य प्रमुख प्रजाति है जो भारत में अच्छी पैदावार देती है। यह मध्य और दक्षिण भारत में उगाई जाती है और विभिन्न प्रकार के मौसम और भूमि की स्थितियों में अच्छी उपजाऊता प्रदान करती है। 3. कल्लयान सोना (WH 542) : यह भी एक प्रमुख गेहूं की प्रजाति है जो भारत में उगाई जाती है और अच्छी पैदावार देती है। यह विभिन्न भागों में उगाई जाती है और भूमि और मौसम की विभिन्नताओं में अच्छी उपजाऊता प्रदान करती है। यहां दी गई प्रजातियां भारत में प्रसिद्ध हैं और अच्छी पैदावार देने वाली मानी जाती हैं, लेकिन गेहूं की बेहतर प्रदर्शन देने वाली प्रजातियों का चयन भूमि, मौसम और विशेष रोपण प्रणाली के आधार पर किया जाता है।

गेहूं की बाली में ज्यादा दाने भरने के लिए ये उपाय जरूर आजमाएं

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गेहूं की बाली में ज्यादा दाने भरने के लिए आप कुछ महत्त्वपूर्ण तकनीकों को अपना सकते हैं: 1. बीज का चयन : अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करें। प्रदर्शित प्रदर्शन, अनुभव और उच्च उत्पादकता वाले हाइब्रिड बीजों का चयन करें। 2. उचित पोषण : गेहूं को उचित मात्रा में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, और पोटाश की खाद प्रदान करें। इसके लिए स्थानीय खाद्यानिकी का उपयोग करें। 3. समय पर सिंचाई : नियमित सिंचाई करें और जलकीर्णता को बढ़ावा दें, खासकर गर्मी के मौसम में। 4. बीमारियों और कीटों का नियंत्रण : फसल को कीटनाशकों और फंगिसाइडों से बचाएं ताकि पौधों पर कोई बीमारी न लगे। 5. अच्छी मानसिकता का परिपालन : गेहूं की सही देखभाल के साथ-साथ, खेतीकर्ता की देखभाल और मानसिकता भी महत्त्वपूर्ण है। सवारी करें और खेती के साथ खुश और सकुशल रहें। 6. अच्छा वातावरण : गेहूं की उच्च उत्पादकता के लिए उच्च तापमान, पर्याप्त जल, और अच्छी मिट्टी की आवश्यकता होती है। 7. बुआई और बीमारियों का नियंत्रण : गेहूं की बुआई के समय अच्छी तकनीक का इस्तेमाल करें और बीमारियों का नियंत्रण करें। यह सभी कदम उन्हीं क्षेत्रों में सफलता प्राप्त क...

कपास की रिकॉर्ड तोड पैदावार लेने का एकदम नया तरीका

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आज हम आपको कपास कीं फसल के बारे में बहोत ही जरूरी जानकारी देने वाले है। जिससे कपास की पैदावार जबरदस्त होंगी ये जानकारी मिट्टी की जांच करने के बाद बनाई गईं है। और अच्छी बागवानी वाली जमीन के लिए है। एक एकड़ खेत में कपास की बुवाई करने से पहले  24 किलो नायट्रोजन  20 किलो फाॅस्फरस 10 किलो पोटॅश जमीन मे अच्छेसे मीला देना है, या बुवाई कर देना है। कपास की बुवाई के 25 दिन बाद 12 किलो नायट्रोजन 10 किलो फाॅस्फरस 10 किलो पोटॅश . देना है। फीर कपास की बुवाई के 50 दिन बाद 12 किलो नायट्रोजन  फाॅस्फोरस नहीं दालना है 10 किलो पोटॅश. देना है। फीर कपास की बुवाई के 75 दिन बाद 12 किलो नायट्रोजन फाॅस्फोरस नहीं दालना है 10 किलो पोटॅश .देना है। एक बार अपने खेत के मिट्टी की जांच जरुर करें  और नजदीकी कृषि वैज्ञानि या कृषि सलाहकार की राय अवश्य लें . विडीओ देखने के लिए 👇दिए गए लिंक को क्लिक करें कपास की रिकॉर्ड तोड पैदावार लेने का एकदम नया तरीका

गेहूं की ज्यादा पैदावार लेने के लिए क्या करें

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  गेहूं की ज्यादा पैदावार (उत्पादन) प्राप्त करने के लिए कुछ उपाय हो सकते हैं: 1. उचित बीज चयन : उच्च गुणवत्ता वाले और प्रदर्शनशील बीजों का चयन करें जो आपके क्षेत्र की मौसमी शर्तों में अच्छा उत्पादन कर सकते हैं। 2. बेहतर पोषण : खाद्य सामग्री की सही मात्रा में प्रदान करें, जैसे कि अच्छी खाद्य, जल, और मिट्टी में आवश्यक तत्वों की सुरक्षा। 3. समय पर कृषि तकनीक : बुवाई, जलकीर्णता, और खाद्य देने का समय पर करें ताकि पौधों को सही समय पर सहायता मिले। 4. कीट और रोग नियंत्रण : पौधों को कीटनाशक और फंगिसाइड से बचाव करें ताकि उन्हें किसी भी बीमारी या कीट से नुकसान न हो। 5. प्रौद्योगिकी का उपयोग : सेंसर्स, इर्रिगेशन टेक्नोलॉजी, और अन्य तकनीकी उपायों का उपयोग करें जो उत्पादन में सुधार कर सकती हैं। 6. उचित वितरण : पानी की सही मात्रा और समय पर प्रदान करें और सुनिश्चित करें कि संसाधनों का सही ढंग से उपयोग किया जा रहा है। इन उपायों का अच्छी तरह से पालन करके, आप गेहूं की ज्यादा पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करना भी महत्त्वपूर्ण है कि आप स्थानीय कृषि विज्ञानी या कृषि विशेषज्ञों से सलाह लें जो...

सोयाबीन में अंकुरण की समस्या क्यों आती है।

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आज हम आपको सोयाबीन में जो अंकुरण की समस्या होती है, जिसे हम बीज ना उगना, बीज का जर्मीनेशन ना होना कहते है, इस बारे में बहुत ही जरूरी जानकारी देने वाले है। जब आपके खेत में सोयाबीन की हार्वेस्टींग हो रही हो तभ आपको इन 4 बातों का ख्याल रखना है। सबसे पहले  जब हमारे खेत में सोयाबीन की हार्वेस्टींग होती है, तो हम सोयाबीन को बोरियों में भरकर रख देते है, और उसे देखते नहीं, ईस वजह से सोयाबीन में अंकुरण (germination) की समस्या आती है। सोयाबीन को बोरियों में भरकर रखे हुए एक साल से ज्यादा टाइम हो जाए तो सोयाबीन के बीजों को बिना अंकुरण की जांच कीए (germination test) बुवाई ना करें। दूसरी बात ये है सोयाबीन के बीजों को कडक धूप में सुखाकर बोरियों मे भरकर रखने से बीजों का अंकुरण (germination) कम हो जाता है। तीसरी बात ये है जब हम सोयाबीन को थ्रेशर मशीन से हार्वेस्टींग करें, तो मशीन की स्पीड 400 आर.पी.ए. से ज्यादा हुई तो बीज के अंकुरण (germination) को धक्का लगता है और बीज ज्यादा उगता नहीं है। चौथी बात ये है...

खेत में सेंसर लगाने के फायदे

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सेंसर्स खेती में एक महत्त्वपूर्ण और आधुनिक तकनीक है जो किसानों को अपनी फसलों की देखभाल, प्रबंधन, और उत्पादकता को सुधारने में मदद करती है। यहां कुछ चरणों में सेंसर से खेती को कैसे किया जा सकता है: 1. सेंसर इंस्टालेशन : शुरुआत में, विभिन्न सेंसर्स को खेत में इंस्टॉल किया जाता है। ये सेंसर्स विभिन्न पैरामीटर्स जैसे कि मिट्टी की नमी, वायुमंडल, तापमान, फसल के स्वास्थ्य, और पानी की उपलब्धता को मापते हैं। 2. डेटा संग्रहण : सेंसर्स से आने वाले डेटा को संग्रहित किया जाता है ताकि खेती के लिए उपयोगी जानकारी प्राप्त की जा सके। 3. डेटा विश्लेषण : संग्रहित डेटा को विश्लेषित करके, किसान फसलों की सेहत, प्रकृतिक संसाधनों की स्थिति, और उपयुक्त उपायों के बारे में समझ पाता है। 4. नियोजन और निर्णय : इस डेटा का उपयोग करके किसान उपयुक्त निर्णय लेते हैं, जैसे कि कौन सी खेती तकनीक अनुचित हो सकती है, कब और कितना पानी देना चाहिए, कौन सी खाद या कीटनाशक प्रयोग करना चाहिए, आदि। सेंसर से खेती किसानों को अनुकूल तकनीकी ज्ञान प्रदान करती है, जो उन्हें बेहतर फसल प्रबंधन और उत्पादकता में मदद कर सकती है।

पाँच दानी तुव्वर (अरहर) की खेती से बहोत सारे पैसे कमाये

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जैसा कि हम सब जानते है। तुव्वर कि फसल एक ऐसी फसल है ,जो हमे बहोत सारे पैसे दे सकती है। आज हम एक ऐसीही तुव्वर की वेरायटी के बारेमे जानने वाले है ,जिसका नाम है (पाच दानी तुव्वर) ये जो तुव्वर की वेरायटी है । बहोत ही कम खर्चे में आने वाली तुव्वर है ।और इसकी खास बात ये है कि इसकी फल्ली में पांच दाने है। और दाने बहोत बड़े है।और फल्ली बी बहोत बड़ी है। ये तुव्वर की फल्ली दूसरे तुव्वर की फल्ली से काफी बड़ी है। ये जो पाच दानी तुव्वर है ।इसे लगाने के बाद जब इसे फूल आएंगे तब एक पानी देना होंगा। और जब फूल की फल्ली बन जाये और कुछ फूल बाकी हो तब अंदाज़ा देख कर पानी दे ।वैसे तुव्वर एक पानी मे आ जाती है।अगर ज़मीन हल्की हो तो और एक पानी दे सकते है। और एक बात जब ये तुव्वर फूल में हो और मौसम खराब हो तो उस पर एक दवा की स्प्रे करे दवा कृषि अधिकारी से पूछ कर अपने नजदीकी कृषि सेवा केंद्र से ले ।स्प्रे करते समय अपने मु पर मास्क ओर हाथ मे हैंडक्लोज़ पहेने  ये तुव्वर लगाने के बाद 5 महिने में आती है ।

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