सोयाबीन की कौन सी वैरायटी है बेस्ट: गोल पत्तों वाली या नुकीले पत्तों वाली? जानें पूरी सच्चाई

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  खेती-किसानी के आज के इस ब्लॉग में सभी किसान भाइयों का स्वागत है। सोयाबीन की बोनी का समय आते ही हमारे मन में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि सोयाबीन की कौन सी प्रजाति लगाएं? गोल पत्तों वाली या नुकीले पत्तों वाली? दोनों ही वैरायटियों के अपने-अपने अनोखे और शानदार फायदे हैं। अगर आप सही चुनाव नहीं कर पा रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है। आइए दोनों की तुलना करते हैं ताकि आप अपनी जमीन और जरूरत के हिसाब से सही फैसला ले सकें। नुकीले पत्तों वाली सोयाबीन: सुरक्षा और हवा का बेहतरीन तालमेल नुकीले पत्तों वाली सोयाबीन की प्रजाति उन किसानों के लिए वरदान है जो कीटों और बीमारियों से परेशान रहते हैं। इसके मुख्य फायदे निम्नलिखित हैं:  प्राकृतिक कीट नियंत्रण: नुकीले पत्तों की बनावट ऐसी होती है कि हानिकारक कीटों (जैसे इल्ली) को इन पर अंडे देने में बहुत मुश्किल होती है। इससे आपकी फसल प्राकृतिक रूप से सुरक्षित रहती है। निचली फलियों का पूरा विकास: इन पत्तों के बीच खाली जगह होने के कारण सूरज की रोशनी और ताजी हवा पौधे के सबसे निचले हिस्से तक आसानी से पहुंचती है। नतीजा यह होता है कि नीचे की फलियां भी उतनी...

फूले दृवा (KDS 992) सोयाबीन है, सबसे ज्यादा पैदावार देनेवाली सोयाबीन की प्रजाति

 आज आपको सोयाबीन की सबसे ज्यादा पैदावार देनेवाली प्रजाति के बारे में बताने वाले है, ये सोयाबीन की प्रजाति बहोत ही जबरदस्त है, और किसान भाई को बहोत ही ज्यादा फायदा पहोचाने वाली है,

पूरा वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करे


                    इस प्रजाति का नाम है फूले दृवा 

KDS 992

                  


इस प्रजाति को महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी . कृषि संशोधन केंद्र , डिग्रज . इन्होंने विकसित किया है। 

इस प्रजाति की खासियत ये है की , इस प्रजाति के पौधे का फैलाव और  इसकी हाइट अच्छी है, जिसके कारण इसमें फूल और फल्लियां बहोत ज्यादा तादात में लगती है,

इसका दाना बहोत मोटा होता है, और उसमे 18.25% तेल होता है, जिसके कारण ये प्रजाति सबसे ज्यादा पैदावार देती है।

एक एकड़ के लिए आपको 25 से 30 किलो बीज लगेंगा और ये प्रजाति 100 से 105 दिनो में पककर तयार हो जाएंगी।

इस प्रजाति में रोगों सहेने की क्षमता अच्छी है, जिसके कारण इसमें ज्यादा रोग नही आता

इसकी पैदावार 25 से 30 क्विंटल पर हेक्टर है, 

किसान भाइयों को इस प्रजाति ने 15 क्विंटल पर एकड़ की पैदावार दी है।

इस प्रजाति को दक्षिण महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, के लिए शिफारस की गई है





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